इस बार दुर्गा पूजा का सारा पुण्य प्रसाद हमारे चिरकालिक लोकप्रिय नायक श्री रावण जी के नाम रहा ... जिसका अप्रत्यक्ष श्रेय हम सभी FB और Whatsapp पर घंटो समाधी में लीन रहने वाले ज्ञानी_ध्यानी बापुओं को भी जाता है ।
हम सभी ने साभार ये स्वीकार भी किया कि रावण जी के साथ घोर अन्याय हुआ है और उनको भविष्य में हमारे रुढ़िवादी समाज में यथोचित स्थान सुनिश्चित करने हेतु गहन चिंतन मंथन करने की अतिआवश्यक्ता है ।
कुछ बुद्धिजीवियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि
"बीच चौराहे आज़ खड़ा दसानन..
अपलक गोया नसीब पर रोए .....
अँसुअन पूछत अये दहन के पुजारी..
तुममें अब राम बचा क्या कोए ......"
अपलक गोया नसीब पर रोए .....
अँसुअन पूछत अये दहन के पुजारी..
तुममें अब राम बचा क्या कोए ......"
सच कहूँ तो .. ऐसे सारगर्भित उक्तियों को देख पढ़कर कलेजा मुंह को चला आता है.. पर उनको अब यह कौन समझाए कि हमारे जैसे आम आदमी के लिए राम सरीखा बनना उतना ही कष्टप्रद है जितना कि nestley की maggy में से lead ढूँढना ।
पता नहीं बिचारे प्रकृति की करारी मार झेल रही हमारे देश की किसान बिरादरी FB और Whatsapp पर नित्य नए अनवरत एवं द्रुतवेग से प्रवाहित ऐसे गूढ़ तत्वज्ञानों से कितना लाभ उठा पा रही होगी ... शायद हमारी बहुप्रतिक्षित डिजिटल इण्डिया प्लान उनके करोड़पति बनने जैसे उम्मीदों को साकार कर पाए ... आमीन ।
उनके खेतों की सुखी दरारें ..
अब तो बस अपनी बची खुची खुशियों में ही जीना सिख चुकी हैं ।
अब तो बस अपनी बची खुची खुशियों में ही जीना सिख चुकी हैं ।
काश अगर वो बोल पाती तो जरूर कहतीं ...
"सूखी बंजर सी हूँ मैं ..
ख़ाली सा बियांबां तुम्हारा भी है ..
धानी आँचल बिन अधूरी हूँ मैं ..
तृष्णाओं का अधूरापन तुम्हारा भी है ..."
ख़ाली सा बियांबां तुम्हारा भी है ..
धानी आँचल बिन अधूरी हूँ मैं ..
तृष्णाओं का अधूरापन तुम्हारा भी है ..."
"...मनुज तेरी फ़ितरत पे हैरां हूँ मैं ..
वीरान हृदय में विचारों की फसल कैसे ऊगा लेते हो ..
हर दिन गुजरते हो एक नए दर्दभरे प्रयोग से .
फिर बहते आँसुओं के साथ कैसे मुस्कुरा लेते हो ......"
वीरान हृदय में विचारों की फसल कैसे ऊगा लेते हो ..
हर दिन गुजरते हो एक नए दर्दभरे प्रयोग से .
फिर बहते आँसुओं के साथ कैसे मुस्कुरा लेते हो ......"
..... मेरी अभिव्यक्ति ... .
* समीर *



